मीट करों का नकारात्मक पहलू
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पशु उत्पाद की खपत को कम करने के लिए मीट पर कर लगाने का विचार वर्षों से पशु और जलवायु समर्थकों के लिए उत्साह का विषय रहा है। यह अवधारणा आकर्षक रूप से सरल है: मीट और अन्य पशु उत्पादों के उत्पादन या खरीद पर कर लगाने से उपभोक्ता के लिए लागत बढ़ जाएगी। यह, मानक आर्थिक सोच के अनुसार, इससे लोग को कम पशु उत्पाद खरीदेंगे और इस प्रकार भोजन के लिए पाले गए पशुओं की संख्या कम होगी।
राष्ट्रों के पास पहले से ही व्यवसायों और उपभोक्ताओं से कर एकत्र करने के लिए बुनियादी ढांचा है, जिससे इस नीति को लागू करना आसान हो जाता है। काल्पनिक रूप से, जुटाए गए राजस्व का उपयोग पशु उत्पादों के सेवन के कुछ नकारात्मक परिणामों, जैसे कि पर्यावरण पर प्रभाव, की भरपाई के लिए किया जा सकता है।
लेकिन, मीट कर जैसी नीति का आकलन करने में एक मुख्य कठिनाई यह है कि इसे आज तक दुनिया में कहीं भी लागू नहीं किया गया है। इसलिए, इस तरह के प्रस्ताव के पशु कल्याण लाभ अभी भी प्रत्याशित हैं। इस रिपोर्ट में, एनिमल आस्क यह समझने के लिए पिछले 19 अध्ययनों की जांच करता है और एक मॉडलिंग प्रयोग करता है कि यूके में मीट कर लगाना जानवरों की पीड़ा को कैसे प्रभावित कर सकता है।
प्रमुख निष्कर्षों में से एक यह है कि मीस करों के पीछे की अधिकतर प्रेरक शक्ति पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए चिंता रही है, जिसमें पशु कल्याण पर बहुत कम ध्यान दिया गया है। इस वजह से, मौजूदा साहित्य में अधिकांश मीट करों का डिजाइन उच्चतम पर्यावरणीय लागत वाले पशु उत्पादों (विशेष रूप से गाय और भेड़) पर अधिक ध्यान केंद्रित करता है और छोटे जानवरों जैसे मुर्गों और मछलियों पर बहुत कम ध्यान देता है। रिपोर्ट में पाया गया कि, हो सकता है यह उपभोक्ता को पौध-आधारित विकल्पों की ओर धकेले, लेकिन मुर्गियों और मछलियों की अधिक खपत की ओर भी भेज सकता है। रिपोर्ट इस प्रभाव को “छोटे पशु प्रतिस्थापन समस्या” कहती है। इसके साथ दोहरी समस्या है: पहली, छोटे शरीर वाले जानवर अपने बड़े शरीर वाले समकक्षों की तुलना में अधिक पीड़ा अनुभव कर सकते हैं। दूसरी, उपभोक्ताओं को लाल मांस से मिलने वाले पोषक तत्वों की समान मात्रा पाने के लिए छोटे शरीर वाले जानवरों को अधिक मात्रा में खाना पड़ेगा।
यह समझने की कोशिश करने के लिए कि मीट कर के परिणामस्वरूप छोटे पशु प्रतिस्थापन समस्या पशु उत्पाद के खपत की समग्र गिरावट से अधिक हो जाएगी या नहीं, लेखक ने उन 19 मौजूदा अध्ययनों के आधार पर नौ मॉडल्स तैयार किए, जो उन्होंने अपनी रिपोर्ट को सूचित करने के लिए उपयोग किये थे। उन्होंने प्रत्येक मॉडल में छोड़ी गई या जोड़ी गई जानवरों पीड़ा की कुल मात्रा निर्धारित करने के लिए “उपभोग किये गए पशु-वर्ष” नामक एक उपाय बनाया। यह मानते हुए कि पाले गए पशुओं का जीवन कुल मिलाकर नकारात्मक है, किसी भी दिए गए परिदृश्य में पशु-वर्षों की संख्या जितनी अधिक हो, उस परिदृश्य में उतनी ही अधिक पीड़ा हुई होगी।
रिपोर्ट में पाया गया है कि, मॉडल किए गए नौ परिदृश्यों में से, पांच ने निवल कल्याण में सुधार प्रदर्शित किया। इसका अर्थ यह है कि उपभोग किये गए पशु-वर्षों में कमी आई, इस मामले में 2.28 और 18.4 मिलियन वर्षों के बीच। लेकिन, अन्य चारों अध्ययनों में पशु हानि में शुद्ध वृद्धि देखी गई जो 1.55 और 15 मिलियन उपभोग किये गए पशु-वर्षों के बीच थी। इस निष्कर्ष का अर्थ है कि यह बहुत अनिश्चित है कि मीट कर का जानवरों की पीड़ा पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा या नकारात्मक।
रिपोर्ट के अनुसार, मीट कर के अन्य नकारात्मक पहलू भी हैं। उदाहरण के लिए, जनमत सर्वेक्षणों से पता चलता है कि ब्रिटेन की जनता आमतौर पर इस विचार के प्रतिकूल है। रिपोर्ट में 2021 के एक सर्वेक्षण का हवाला दिया गया है जिसमें पाया गया कि यूके में 55% लोग मीस कर के विरोध में थे। कुछ संकेत हैं कि इसकी आय को पर्यावरण को बेहतर करने की दिशा में लगने की प्रतिबद्धता होने पर समर्थन बढ़ता है। लेकिन, समर्थन बढ़ाने के लिए पशु कल्याण सबसे कम संभावित कारण है। इसका अर्थ यह है कि कोई भी सफल मीट कर अधिक संभावतः पर्यावरण संबंधी चिंताओं से प्रेरित होगा, जिससे छोटे पशु प्रतिस्थापन समस्या उभरने की संभावना अधिक हो जाती है।
लेखक संभावित मीट कर के कई अप्रत्यक्ष प्रभावों को भी इंगित करता है। उदाहरण के लिए, अंडा उद्योग में उन नर चूज़ों को मारना आम बात है, जिनका उपयोग अंडे देने के लिए नहीं किया जा सकता है। कुछ मामलों में, इन चूज़ों को फिर पालतू सांपों और अन्य रेंगनेवाले जन्तुओँ के भोजन के रूप में उपयोग किया जाता है। यदि एक मीट कर अंडे की खपत को कम करता है, तो साँप के भोजन के इसकी जगह पर और चूहों और मूसों को मारे जाएगा। इस बात की भी संभावना है, यदि कर उपभोग-आधारित के बजाय उत्पादन-आधारित होगा, तो उपभोक्ता महंगे घरेलू उत्पादों से बचने के लिए अनियंत्रित आयातित मीट की ओर रुख करेंगे।
इस सब को एक साथ लेते हुए, रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि पशु समर्थकों के लिए मीट कर फोकस नहीं होना चाहिए। इस नीति को आम जनता और नेताओं को समर्थन करने के लिए राज़ी करने हेतु संभावतः बहुत प्रयास करना पड़ेगा और सफल होने पर भी यह स्पष्ट नहीं है कि इससे पशुओं को लाभ होगा या नहीं। इसके बजाय, लेखक का सुझाव है कि, प्रचारकों को अन्य रणनीति पर ध्यान देना चाहिए जिनकी प्रभावशीलता के मज़बूत सहायक साक्ष्य हों। ऐसी रिपोर्ट्स सतह की गहराई तक देखने और पक्षसमर्थन दृष्टिकोण पर शुरू होने से पहले सभी संभावित प्रभावों पर विचार करने का एक सहायक रीमाइंडर होती हैं।

